Thursday , 21 May 2026

लोक कलाओं की हमारी परम्पराओं को बचाए रखना जरूरी

राज्यपाल श्री कलराज मिश्र ने कहा है कि आधुनिकता के शोरगुल में लोक कलाओं की हमारी परम्पराओं को बचाए रखना जरूरी है। उन्होंने लोक कलाओं की पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही विरासत को समय संदर्भों के साथ संरक्षित और विकसित करने का आह्वान किया है।
श्री मिश्र शनिवार को राजभवन में भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद् द्वारा आयोजित ‘कला संवाद’ कार्यक्रम में संबोधित कर रहे थे। उन्हांेने कहा कि जिस तरह से हमारे यहां शास्त्रीय नृत्य और संगीत के घराने हैं, उसी तरह राजस्थान में लोक कलाओं के घराने हैं। इन घरानों ने राजस्थान की सांस्कृतिक विरासत को पीढ़ी दर पीढ़ी सहेजकर रखा है। उन्होंने ऐसे कलाकारों को सरकार और समाज द्वारा मिलकर सहयोग करने और सांस्कृतिक विरासत के दस्तावेजीकरण के लिए भी मिलकर कार्य करने का आह्वान किया।
राज्यपाल कहा कि किसी भी सभ्यता के अस्तित्व और सांस्कृतिक अस्मिता की जब भी बात की जाती है तो सबसे पहले कलाओं के लोक स्वरूपों पर ही विचार किया जाता है। उन्होंने अल्लाह जिलाई बाई और उनकी मांड राग की चर्चा करते हुए कहा कि विदेषों तक ‘पधारो म्हारे देष’ के जरिए राजस्थान की लोक संस्कृति उस महान कलाकार के जरिए ही पहंुची। उन्हांेने राजस्थान की ढोली, मिरासी, दमामी, लंगे, मांगणियार, कालबेलिया आदि जातियों और उनके कला योगदान को महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि इनकी कला का प्रभावी रूप में दस्तावेजीकरण भी किया जाना चाहिए।
भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद् के अध्यक्ष डॉ. विनय सहस्रबुद्धे ने कहा कि यह महत्वपूर्ण है कि राजस्थान के राजभवन से लोक कलाकारों से संवाद की पहल की गयी है। उन्होंने कहा कि भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद का प्रयास है कि सुदूर देषों तक भारतीय कलाओं के जरिए हमारी संस्कृति का प्रसार हो। उन्होंने देष के तंतु वाद्यों की परम्परा को विदेषों में भी संरक्षित किए जाने और इनके लिए वातावरण निर्माण हेतु कलाकारों के सहयोग का भी आह्वान किया। उन्होंने कहा कि यह बहुत महत्वपूर्ण है कि राजस्थान के लोक कलाकारों ने पूरे भारत की दूसरी कलाओं के मेल से अपने आपको समृद्ध और संपन्न किया है।
इस अवसर पर राज्यपाल और भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद् के अध्यक्ष डॉ. विनय सहस्रबुद्धे ने लोक कलाकारों से एक-एक कर संवाद भी किया और उनकी कलाओं तथा योगदान के साथ भविष्य की योजनाओं तथा सहयोग पर चर्चा की।
सुप्रसिद्ध लोक गायिका श्रीमती बेगम बतूल ने गणेष वंदना करने के साथ ही ‘पधारो म्हारे देष’ की सुमधुर प्रस्तुति दी। उनके साथ बाद में वहां उपस्थित मांगणियार, लंगा, सपेरा समुदाय के कलाकारों ने भी स्वर मिलाते हुए लोक का सामुहिक स्वर-उजास बिखेरा। कार्यक्रम का संयोजन प्रख्यात कलाकार अनवर हुसैन ने किया।
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कलाकारों की उपस्थिति में हुआ ‘कला-मन’ का लोकार्पण
राज्यपाल और डाॅ. विनय सहस्त्रबुद्धे ने किया डाॅ. राजेष कुमार व्यास की पुस्तक का लोकार्पण
कलाओं की गहराई में उनकी रोचक व्याख्या करने वाले लेखक हैं डाॅ. व्यास

जयपुर, 20 अगस्त। राज्यपाल श्री कलराज मिश्र और भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिेषद् कंे अध्यक्ष डाॅ. विनय सहस्त्रबुद्धे ने शनिवार को राजभवन में संस्कृतिकर्मी, कवि, कला आलोचक और राजभवन में संयुक्त निदेषक के पद पर कार्यरत डाॅ. राजेष कुमार व्यास की पुस्तक ‘कला-मन’ का लोकार्पण किया।
राज्यपाल श्री मिश्र ने लोकार्पण समारोह में कहा कि डाॅ. राजेष कुमार व्यास कलाओं की गहराई में जाकर उनकी व्याख्या इस रोचक ढंग से करते हैं कि, लगता है हम शब्दों में कलाओं का आस्वाद कर रहे हैं। उन्हांेने कहा कि संगीत, नृत्य, नाट्य आदि कलाओं पर व्यास की अपनी मौलिक स्थापनाएं हैं और वह भारतीय कला दृष्टि के इस समय के विरल कला मर्मज्ञ हैं।
श्री मिश्र ने कहा कि डाॅ. राजेष कुमार व्यास भाषा के अपने सहज और कलात्मक सौंदर्य में पढ़ने वालों को लुभाते हैं। उनके लिखे के जरिए संगीत, नृत्य, नाट्य और चित्रकलाओं से हमारी और अधिक निकटता होती है।
भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिेषद् के अध्यक्ष डाॅ. विनय सहस्त्रबुद्धे ने व्यास को उनकी मौलिक कला पुस्तक के लिए बधाई देते हुए कहा कि कलाओं की प्रस्तुतियों के साथ उनकी व्याख्या भी महत्वपूर्ण होती है। इस दृष्टि से व्यास की पुस्तक महत्वपूर्ण है।
लेखक डाॅ. राजेष कुमार व्यास ने कहा कि कलाकारों की उपस्थिति में कलाओं से जुड़ी पुस्तक का लोकार्पण सुखद है। उन्होंने कहा कि संगीत, नृत्य, नाट्य, चित्रकला, छायांकन आदि कलाएं सदा ही मन को संपन्न करती रही है, इस संपन्नता के उजास से ही ‘कला-मन’ का सृजन हुआ है। इस अवसर पर राज्यपाल के प्रमुख सचिव श्री सुबीर कुमार, प्रमुख विषेषाधिकारी श्री गोविन्द राम जायसवाल एवं प्रदेष के प्रतिनिधि कलाकार उपस्थित थे।
‘कला-मन’ पुस्तक –
कला मर्मज्ञ डाॅ. राजेष कुमार व्यास की पुस्तक ‘कला-मन’ वैचारिक निबंधों की पुस्तक है। प्रभात प्रकाषन, नई दिल्ली द्वारा प्रकाषित इस पुस्तक में संगीत, नृत्य, नाट्य, चित्रकला तथा अन्य प्रदर्षनकारी कलाओं से जुड़े महत्वपूर्ण वैचारिक निंबंध संकलित हैं। भारतीय कलाओं की मौलिक स्थापनाएं लिए इस पुस्तक में कलाओं की सूक्ष्म विषेषताआंे के साथ उनसे जुड़े चिंतन और महती आख्यान भी हैं। कलाओं पर अपनी तरह की यह पहली ऐसी पुस्तक है जिसमें पष्चिम की बजाय भारतीय कला दृष्टि के साथ कलाओं के अन्तःसंबंधों, कलाओं से जुड़े भारतीय चिंतन, शास्त्र और लोक कलाओं की समृद्ध परम्परा पर गहन विमर्ष के साथ रसिकता के साथ लेखक ने लालित्य भरा रोचक कला लेखन किया है।

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