आज उत्तर प्रदेष विधानमण्डल के स्थापना के 125 वर्ष पूर्ण हो चुके हैंं। इस विधानमण्डल की श्री लालबहादुर “ाास्त्री, आचार्य नरेन्द्र देव, गोविन्दबल्लभ पन्त, पुरूशोत्तम दास टण्डन, चैधरी चरण सिंह, श्रीमती विजय लक्ष्मी पण्डित,
रफी अहमद किदवई, लियाकत अली खां, पं0 कमला पति त्रिपाठी, झारखण्डे राय, पं0 माधव प्रसाद मानव त्रिपाठी आदि अनेक विभूतियां सदस्य रह चुकी हैं। जिन्होंने आगे चलकर राश्ट्रीय राजनीति में महत्वपूर्ण योगदान किया। यदि यह कहा जाए कि देष की राजनीति की दषा व दिषा इस विधानमण्डल के दोनों सदनों से तय होती रही है तो अतिषयोक्ति नहीं होगी। इस अवसर पर उत्तर प्रदेष विधानमण्डल की 125 वर्शों के स्वर्णिम इतिहास व महत्वपूर्ण उपलब्धियों की चर्चा न हो तो 125वीं जयन्ती का यह अवसर अधूरा रहेगा।
1857 के प्रथम स्वतंत्रता आन्दोलन के पष्चात ईस्ट इण्डिया का “ाासन समाप्त हुआ और 1861 में समस्त विधायी व प्रषासनिक कार्य ब्रिटेन की संसद की हाथों में आ गये। 5 जनवरी 1887 को उत्तर प्रदेष को ‘‘नार्थ वेस्टर्न प्रोविन्सेज एण्ड अवध लेजिस्लेटिव कौन्सिल‘‘ के नाम से विधायिका की स्थापना हुई जिसमें 9 नामांकित सदस्य थे। कौन्सिल की पहली बैठक 8 जनवरी 1887 के इलाहाबाद के थार्नहिल मेमोरियल हाल मे हुई मार्च 1937 तक लेजिस्लेटिव कौन्सिल एकल सदनीय विधानमण्डल के रूप में कार्य करती रही और 1 अप्रैल 1937 को राज्य का विधानमण्डल द्विसदनीय हो गया। लेजिस्लेटिव एसेम्बली और लेजिस्लेटिव कौन्सिल के नाम से दो सदनों की स्थापना हुई और प्रदेष का नाम ‘‘यूनाइटेड प्राविन्सेज‘‘ कर दिया गया।
गवर्नमेन्ट आफ इण्डिया ऐक्ट 1935 के बनने के बाद राज्यों को स्वायत्तता देने व प्रदेष स्तर पर संसदीय प्रणाली पर आधारित सरकारें बनने के क्षेत्र में पहल की गयी और प्रदेष में 228 सदस्यों के साथ लेजिस्लेटिव एसेम्बली का गठन हुआ ये सभी सदस्य निर्वाचित थे और सभी जातियों, वर्गों के हितों हेतु निर्वाचन प्रणाली को आधार बनाया गया। लेजिस्लेटिव एसेम्बली का कार्यकाल 5 वर्श रखा गया। श्री पुरूशोत्तम दास टण्डन विधानसभा अध्यक्ष और सर सीताराम विधान परिशद के अध्यक्ष चुने गये। तत्कालीन विधान परिशद में 100 सदस्य थे। उत्तर प्रदेष एसेम्बली हेतु दिसम्बर 1936 में चुनाव कराये गये और कांग्रेस को उत्तर प्रदेष में बहुमत मिला और पं0 गोविन्द बल्लभ पन्त के नेतृत्व में जुलाई 1937 में मन्त्रिमण्डल बना। परन्तु 3 सितम्बर 1939 को द्वितीय विष्व युद्ध प्रारम्भ होने पर गर्वनर जनरल द्वारा केन्द्र एवं उत्तर प्रदेष विधानमण्डल से परामर्ष के बगैर जर्मनी के विरूद्ध युद्ध में भारत का नाम घोशित कर दिया और असहमत होने के कारण मन्त्रिमण्डल ने इस्तीफा दे दिया और गर्वनर ने असेम्बली निलम्बित कर दी। यह घटना इस बात को दर्षाती है कि उत्तर प्रदेष विधानमण्डल ने राश्ट्रहित को सदैव सर्वोपरि रखा है चाहे सरकार किसी भी दल की हो। द्वितीय विष्वयुद्ध की समाप्ति के पष्चात 1 अप्रैल 1946 को विधानमण्डल का निलम्बन समाप्त हुआ। और पं0 गोविन्द बल्लभ पन्त के नेतृत्व में पुनः सरकार का गठन हुआ।
स्वाधीनता के बाद उत्तर प्रदेष विधानसभा की पहली बैठक 3 नवम्बर 1947 को हुई विधानसभा ने 25 फरवरी 1948 को इलाहाबाद स्थित उच्च न्यायालय और अवध चीफ कोर्ट का विलय करने हेतु प्रस्ताव पारित किया गया।
- वर्ष 1949 में जमींदारी उन्मूलन और भूमि सुधार विधेयक पारित हुए।
- वर्ष 1949 में ही यूपी एग्रीकल्चरल टेनेन्ट्स (एक्वीजीषन आफ प्रिविलेज) बिल पारित किया गया।
18 अक्टूबर 1948 को हैदराबाद निजाम के भारतीय गणराज्य के विलय के पष्चात पूरे विधानमण्डल ने भारत सरकार व सेना कमान को बधाई का प्रस्ताव सर्व सम्मत से पारित किया और यह साबित कर दिया कि उत्तर प्रदेष विधानमण्डल समस्त देषी रियासतों जिनकी संख्या लगभग 560 थी के भारतीय गण्राज्य में विलय के पक्ष में खड़ा रहा। सरकारें बनती रहीं गिरती रही हैं कभी एक दल सत्ता में रहता कभी विपक्ष में रहता है। राजनीतिक दलों में आपस में प्रतिद्वन्दिता रही है, गठबन्धन बनते रहे और टूटते रहे परन्तु राश्ट्र की एकता सुरक्षा प्रदेष हित में सारा विधानमण्डल एक रहा और यही उत्तर प्रदेष विधानमण्डल की विषेशता रही।
राश्ट्रभाशा के प्रति पूरा प्रदेष सदैव एक जुट रहा पूरे प्रदेष में राश्ट्रभाशा का सम्मान किया जाता है। उत्तर प्रदेष विधानमण्डल देष में पहली विधायिका थी, जिसने 1950 में यू0पी0 लैग्वेज ऐक्ट 1950 पारित किया। जिसके अनुसार हिन्दी देव नागरी उत्तर प्रदेष की व्ििपबपंस स्ंदहनंहम घोशित की गई।
26 जनवरी 1950 को भारत के सम्प्रभुता सम्पन्न लोकतांत्रिक गणराज्य बना और 1952 में वयस्क मताधिकार के आधार पर विधानसभा का चुनाव किया गया। विधानसभा सदस्यों की संख्या 228 से 431 हुई जिसमें एक सदस्य एंग्लोइण्यिन समुदाय से नामांकित किया गया। सदस्यों की संख्या बाद में संषोधन के पष्चात 426 कर दी गयी।
उत्तर प्रदेष विधानमण्डल का 125 वर्शों के लम्बे इतिहास में दो बार पुर्नगठन हुआ है। प्रथम बार सन् 1937 में सदन को एकल सदनीय से द्विसदनीय किया गया अर्थात विधानसभा व विधान परिशद का गठन हुआ। दूसरी बार माननीय अटल बिहारी बाजपेई की सरकार के अगस्त 2000 में बनाये गये एक अधिनियम के माध्यम से 8-9 नवम्बर 2000 की मध्य रात्रि को उत्तर प्रदेष का पुर्नगठन किया गया और नवनिर्मित राज्य का नाम उत्तरांचल रखा गया जिसमें पुराने उत्तर प्रदेष राज्य के हिमालय क्षेत्र के 13 जिले सम्मिलित किये गये। वर्तमान में विधनसभा के सदस्यांे की संख्या 402 है और आज भी उत्तर प्रदेष विधानमण्डल देष का सबसे बड़ा विधानमण्डल है।
अपने 125 वर्शों के स्वर्णिम इतिहास में उत्तर प्रदेष विधानमण्डल ने बहुत बडे़ आयाम स्थापित किये। राश्ट्रवाद, स्वदेषी व वसुधैव कुटुम्बकम के सिद्धान्त पर आगे अग्रसर होता रहा है। पूरा देष इस बात को जानता है और स्वीकार करता है कि देष की राजनीति की दषा व दिषा उत्तर प्रदेष की जनता व उत्तर प्रदेष का विधानमण्डल तय करते हैं। यद्यपि प्रदेष में प्राकृतिक संसाधनों की उपलब्धि के बावजूद प्रदेष में अपेक्षित विकास नहीं हो पाया है। स्वास्थ्य व षिक्षा के क्षेत्र में हम कई राज्यों से पीछे हैं। आर्थिक विकास दर काफी नीचे है और कृशि के क्षेत्र में हम आत्म निर्भर नहंीं हो पाये हैं। लेकिन इनसब क्षेत्रों में पिछडे़पन का कारण कार्यपालिका का सुचारू रूप से कार्य न करना हो सकता है।
परन्तु उत्तर प्रदेष विधानमण्डल देष में न केवल सबसे बड़ा है बल्कि सबसे सुचारू रूप से कार्य कर रहा है। चाहे देषी राज्यों का भारतीय गणराज्य में विलय का प्रष्न हो, चीन के साथ 1962 का युद्ध हो या पाकिस्तान के साथ 1965, 1971 या 2003 का कारगिल युद्ध हो उत्तर प्रदेष विधानमण्डल ने सदैव देष व केन्द्र सरकार के साथ रहकर साथ दिया है। सामाजिक न्याय के मामले में भी उत्तर प्रदेष विधानमण्डल ने प्रदेष व देष की सरकारों का पूरा साथ दिया है, अर्थात उत्तर प्रदेष विधानमण्डल की 125 वर्श की कहानी स्वर्णिम अक्षरों में लिखे जाने योग्य है, परन्तु विगत् कुछ वर्शों में जहां देष में क्षेत्रीय दलों का प्रादुर्भाव हुआ दलों की अपनी प्राथमिकताएं बदल गयीं। लोग कल्याण के स्थान पर जातिवादी राजनीति में अपना घर बना लिया है। स्वार्थ की राजनीति सिद्धान्तों पर भारी पड़ने लगी है और ऐसे वातावरण में विधानमण्डल में आरोप प्रत्यारोपों का जो सिलसिला चल रहा है वह सभी के लिए चिन्ता का विशय है। लोकतन्त्र में विरोध होना बहुत ही स्वाभाविक है परन्तु मतभेद को व्यवहार में लाना लोकतन्त्र व मानवता दोनों के लिए अहितकारी है। बात-विवाद व चर्चा में “ाालीनता का होना हमारी लोकतान्त्रिक संस्कृति का अभिन्न अंग रहा है, परन्तु विगत् कुछ वर्शों में विधानसभा चर्चाआंे के स्तर में जो गिरावट आयी है उससे मुझे बहुत पीड़ा होती है।
यक्ष प्रष्न यह है कि क्या हम अपने विधानमण्डल के गौरवषाली इतिहास स्वर्णिम युग को यथावत रख पायेंगे ? मेरा आज की युवा पीढ़ी से यही आग्रह है कि अपनी “ाानदार संस्कृति व परम्परा को व्यक्तिगत स्वार्थों से ऊपर रखते हुए अपने विधानमण्डल की गरिमा को बनाये रखें।
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